अनलॉक 1.0 के पहले चरण में शहर की आबोहवा बेहतर है। एक जून का आंकड़ा देखा जाए तो गीडा, गोलघर स्थित जलकल और मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) में पर्यावरण का स्तर मार्च से बेहतर पाया गया। इसका मुख्य कारण लॉकडाउन बताया जा रहा है।
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विश्व पर्यावरण दिवस
- फोटो : आनंद चौधरी।
लॉकडाउन से पहले शहर के वातावरण में खतरनाक हद तक सेहत के लिए हानिकारक तत्व घुले थे। हवा का क्वॉलिटी इनडेक्स बेहद खराब था। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि हवा में प्रदूषण बढ़ा तो लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है। विशेषकर सांस के मरीजों को सतर्क रहना होगा।
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विश्व पर्यावरण दिवस
- फोटो : आनंद चौधरी।
पर्यावरणविदों का कहना है कि लॉकडाउन में वाहनों का आवागमन बेहद कम है। ज्यादातर औद्योगिक इकाइयां अप्रैल और मई में बंद रहीं। इसका असर साफ तौर पर दिखा है। वातावरण में आक्सीजन की मात्रा अच्छी हुई है। नुकसानदायक तत्वों की मात्रा कम हुई है। हालांकि अनलॉक के अगले चरणों में पर्यावरण की अच्छी स्थिति बरकरार रहने की संभावना कम ही है।
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विश्व पर्यावरण दिवस
- फोटो : शिव हर्ष द्विवेदी।
दरअसल, लॉकडाउन से पहले गोरखपुर की हवा खतरनाक थी। वातावरण में पार्टीकुलेट मैटर (पीएम), सल्फर डाई आक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइडनुकसानदायक स्तर तक पहुंच गए थे।
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- फोटो : शिव हर्ष द्विवेदी।
मार्च के अंतिम सप्ताह में लॉकडाउन हो गया। इससे औद्योगिक गतिविधियां ठप पड़ गईं। वाहनों का आवागमन लगभग ठप हो गया। इसी का नतीजा रहा कि रामगढ़ताल, राप्ती नदी, आमी नदी, रोहिन नदी, गोर्रा नदी और चिलुआताल का प्रदूषण कम हो गया। पानी में आक्सीजन की मात्रा बढ़ गई।
एमएमएमयूटी की तरफ से शहर के जिन तीन स्थानों पर प्रदूषण मापने की मशीन लगाई गई है, वहां की आबोहवा भी अच्छी मिली है। अब सांस लेने में दिक्कत नहीं महसूस हो रही है।