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Social Media Poetry: आओ सहेज लें पलों को

कविता
                
                                                         
                            आओ सहेज लें इन पलों को 
                                                                 
                            
कि कल हम रहें न रहें 
अपने पहलू में मुझको छिपा लो 
कि दुनिया की अब नजर न लगे। 

आओ मिलकर नीड़ बनाएं 
वो नीड़ जिसमें दो दिल मिलें। 
नीड़ में गूंजेगीं किलकारियां जब,
हम हंसेंगे दुनिया कुछ भी कहे।

तुम कवि की कल्पना हो 
कल्पना पर मैंने गीत लिखे।
इन गीतों को अधरों पर रख कर 
स्वर इन्हें सुंदर सा दें।
मैं पवन हूं बसंती,
तुम नदी की निर्मल धारा ।
आओ झूमें फिर पवन-सा 
कि नदी भी नर्तन करे।

-राकेश धर द्विवेदी

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2 दिन पहले

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