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ये अंधेरे

                
                                                         
                            ये अंधेरे, ये गर्द-ओ-गुबार राहों के।
                                                                 
                            
अब चुभते ही नहीं , खार राहों के।।

ता-हद-ए-निगाह, ख़ामोशी है , तो।
बुलाता है कौन , उस पार राहों के।।

हर शजर एक सायबान था , फिर।
काट दिये किसने, चिनार राहों के।।

ये दर-दरीचे घर के मुंतजिर हैं तेरे।
मुद्दतों से बंद पड़े हैं , द्वार राहों के।।

पुरवाई झोंकों ने बुझा दिये हैं जो।
जलाये थे दिये, कई बार राहों के।।

वफ़ा करते-करते, क्यूं बेवफा हुए।
पूछते हैं हमसे , ये मज़ार राहों के।।
-यूनुस खान
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एक महीने पहले

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