फकत फूल ही नहीं,खार भी अच्छे लगते हैं।
मुझे , मतलब परस्त यार भी अच्छे लगते हैं।।
अगरचे, हर वक्त ग़ुलाबों के साये में रहा हूं।
मगर,ये दरख़्त-ए-चिनार भी अच्छे लगते हैं।।
हर सिम्त बज़्म-ए-तरब हो , जरूरी नहीं है।
मुझको तो वीराने दयार भी अच्छे लगते हैं।।
कुरबतों ने भी बख्शी है बस तन्हाई हमको।
यूं ही, फांसले-ओ-दरार भी अच्छे लगते हैं।।
ग़म-ए-हिज़्र की आग में , जला हूं मैं तन्हा।
मगर फिर भी, ये गमख्वार अच्छे लगते हैं।।
झूठा ही सही,वस्ल का कोई वादा तो कर।
अक्सर , मुझे ये करार भी अच्छे लगते हैं।।
मयकशी भी, कंहा से कंहा ले आयी मुझे।
फिर क्यूं,सुरूर-ओ-खुमार अच्छे लगते हैं।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X