ग़म-ए-हिज़्र से और निखरी है ग़ज़ल।
सिमटते-सिमटते यूं बिखरी है ग़ज़ल।।
ताज़गी के अहसास से , सराबोर थी।
जब किसी हद से गुज़री है ये ग़ज़ल।।
-यूनुस खान
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