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मेरी ख़ामोशी,सर-ए-बाज़ार देख रहे हैं।।

                
                                                         
                            यूं आज़माकर, मेरा किरदार देख रहे हैं।
                                                                 
                            
मेरी ख़ामोशी,सर-ए-बाज़ार देख रहे हैं।।

तमाम गुलशन, खिंजा के हवाले करके।
जानिब- ए-मौसम -ए-बहार, देख रहे हैं।।

इब्तिदा-ए-तर्क-ए-ताल्लुक करके, अब।
वो दरम्यां फांसले-ओ-दरार देख रहे हैं।।

जिन्हें ख़ारों में दिखते थे, फूल ही फूल।
मगर, अब वो फूलों में खार देख रहे हैं।।
-यूनुस खान
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2 सप्ताह पहले

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