कोई ग़ज़ल कहूं,या कुछ अशआर कह दूं।
अगर तू कहे, तो खिजां को बहार कह दूं।।
ये तर्क-ए-ताल्लुक़ अब बर्दाश्त नहीं होता।
जी करता है अब ये सर-ए-बाज़ार कह दूं।।
-यूनुस खान
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