जुस्तजू -ए-मंज़िल-ओ -मकाम की तलब।
हो जैसे किसी प्यासे को जाम की तलब।।
किसी तहरीर से मन बहलता नहीं है अब।
हर वक्त बनी रहती तेरे पैग़ाम की तलब।।
-यूनुस खान
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