फ़ैसला तो कर , इज़हार तो कर।
अपनी अना का,इकरार तो कर।।
कुरबत नहीं,तो अदावत ही सही।
दरम्यां,खड़ी कोई दीवार तो कर।।
तर्क-ए-ताल्लुक हो गया है,अगर।
ये ऐलान , सर-ए-बाज़ार तो कर।।
माना कि, जायज़ हैं इल्ज़ाम तेरे।
हक-ओ-वक्त पे,एतबार तो कर।।
मंझधार हो साहिल, साथ हैं हम।
मिलकर , ये दरिया पार तो कर।।
कौन तेरा है, ये इल्म हो जायेगा।
शर्त ये है,खुद को बेदार तो कर।।
बेशक,तू हम पर यूं उंगली उठा।
खुद को, तू बा-किरदार तो कर।।
सब्र-ओ-करार, आ जायेगा हमें।
पहले,मौसम खुशगवार तो कर।।
-यूनुस खान
यूनुस खान
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