इस बहाने , सितम ढा रहे हैं लोग।
अयादत को मेरी , आ रहे हैं लोग।।
जब से ये मातम का दौर आया है।
बेबस ही मुझको , भा रहे हैं लोग।।
अगरचे ख़ामोशी पसंद है मुझको।
मगर,ग़म के नगमें गा रहे हैं लोग।।
मुद्दतों बाद, अब भूला हूं मैं जिन्हें।
वही मंजर याद दिला रहे हैं लोग।।
ता-हद-ए-निगाह, अंधेरा देखकर।
दिन में , चिराग जला रहे हैं लोग।।
-यूनुस खान
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