नफ़रतों में भी उसकी प्यार देखा है।
ये मंज़र भी, हमने कई बार देखा है।।
लबों पे पहरे थे, रस्म-ओ-रिवाज के।
आंखों में , ख़ामोश इज़हार देखा है।।
कौन कहता है,उसे मेरी तलब न थी।
तहरीर में तो, हमने इंतजार देखा है।।
हद-ए-निगाह तक,वीराना था जहां।
ख़्वाब में हमने ऐसा, दयार देखा है।।
ग़मजदा लोगों की , बज़्म सजी थी।
हमने जब,चिलमन के पार देखा है।।
कैफियत-ए-अश्क,हमसे तू ना पूछ।
हिज़्र में, अजीब सा खुमार देखा है।।
जब कभी, तसव्वुर में वो आये मेरे।
बेचैनी में भी अपनी,करार देखा है।।
जिस तरफ, खिंजा का अंदेशा था।
उस सिम्त,मौसम-ए-बहार देखा है।।
-यूनुस खान
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