बिन रहबर , और बिन हमसफ़र चले।
मालूम नहीं हमें, हम किस डगर चले।।
सहरा में, सायबान मिल सके हमको।
इसलिए तो, मेरे संग-संग शजर चले।।
हर सिम्त, हद-ए-निगाह तक जायेंगे।
हम , गांव-गांव और नगर-नगर चले।।
गली-गली तुझको तलाश करेंगे हम।
तेरी ही जुस्तजू में, यूं दर-ब-दर चले।।
कब कौन किस-किस वादे से मुकरा।
हम इन सबको, करके दरगुज़र चले।।
काफिलों के तौर-तरीके पता नहीं हैं।
देखो,जानिब-ए-मंजिल,बेख़बर चले।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X