आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क्या है शम्मा के करीब परवानों का इकट्ठा होना।।

                
                                                         
                            बेबस नहीं यूं साहिल पर तूफ़ानों का इकट्ठा होना।
                                                                 
                            
बेमानी है नम आंखों में अरमानों का इकट्ठा होना।।

बड़ी तवक्को थी मयखाने आकर ये प्यास बुझेगी।
पर आस तोड़ गया प्यासे पैमानों का इकट्ठा होना।।

दर-ए-मुंसिफ जाके इंसाफ की गुहार लगाते कैसे।
हमें डरा गया,यूं बेईमान दरबानों का इकट्ठा होना।।

ख़ुदा के लिए अब बज़्म सजाने की जिद न करो।
बज़्म ख़ुद सजा देता है, दीवानों का इकट्ठा होना।।

शाम ढलते ही सितारों ने आकर ये पूछा है हमसे।
क्या है शम्मा के करीब परवानों का इकट्ठा होना।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर