हरे जख़्मों को भी पुराने बताते हैं लोग।
बहते अश्कों को पैमाने बताते हैं लोग।।
वो लम्हे जिन्हें हिज़्र के लम्हे कहा मैंने।
उन्हें कुरबत के ज़माने, बताते हैं लोग।।
वीरानों ने समेट ली है, रौनक जिनकी।
अफ़सोस उन्हें ठिकाने बताते हैं लोग।।
किससे कहूं, जाके दर्द-ओ-गम अपने।
गुफ्तगू को भी, फसाने बताते हैं लोग।।
-यूनुस खान
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