यूं तो यह संभव नहीं
की याद करूं बस एक दिन उनको,
जन्म से पूर्व ही वो मेरी थी
फिर कितना बोलूं शुभ मातृ दिवस उनको।
हृदय मेरा अब धड़कता
जाने कितनों की सोंच में,
पर सत्य यही है
प्रथम धड़कन थी मेरी उनकी ही कोख में।
जाने दुनिया से मैने जाना
कितनी गड़ना कितनी सीखें,
पर कैसे मैं इंकार करूं
की जितना मैने सीखा है
उसकी नींव का प्रथम पत्थर
मेरी अंबा ने ही रखा है।
संसार का सारा लोभ
व स्वार्थ सारा मैं न मानू,
चूंकि उनके साथ रहकर ही
निस्वार्थ प्रेम की परिभाषा जानू।
मेरे आंसू बहने के पूर्व ही
वो जान जाती मेरा दुख,
कुछ कहके मांग रखूं अपनी
उसके पूर्व ही पहचान जाती वो मेरा सुख।
वर्तमान में मेरा कद उनसे ऊंचा है
पर देख उनका वात्सल्य,
मैंने उनकी गोद में ही
शांत रस की प्रस्तुति देखा है।
कहने व लिखने को मेरे भाव खप रहे नहीं
किंतु शब्दों की कुछ सीमा हैं,
मैं नहीं हूं अच्छी किस्मत का धनी
किंतु इतना हूं कि वो मेरा खुला आसमा हैं,
वो मेरी माँ हैं।
~यशेंद्र कुमार सिंह
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