माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं रहा,
बस याद के अलावा कुछ हासिल नहीं रहा।
फ़ुर्क़त में तेरी यूँ दिल-ए-मुज़्तर नहीं रहा,
दरिया-ए-हिज्र था, मगर साहिल नहीं रहा।
हज़ार शम्अ जलीं, अंजुमन भी रौशन थी,
तेरे बग़ैर रौनक़-ए-महफ़िल नहीं रहा।
तेरी फ़िराक़ में यूँ ही गुज़री है शाम-ए-ग़म,
कि चाँद देखने का शौक़-ए-दिल नहीं रहा।
टूटे हुए दिलों का किससे तज़्किरा करें,
कोई भी मेरे दर्द में शामिल नहीं रहा।
हर एक शख़्स ग़म में ख़ुद के मुब्तिला रहा,
कोई भी मेरी जानिब-ए-माइल नहीं रहा।
-वकील अहमद रज़ा
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