हमारी तो यूँ ही कट जाएँगी ज़िंदगी की रातें,
तुम्हारे महल तुम्हें मुबारक हों।
ख़्वाब तो थे चाँद-सितारों को पाने के,
मगर ज़िंदगी के सफ़र में ज़मीं भी मयस्सर न हुई।
हज़ार गिले-शिकवे हैं तुझसे, ऐ ज़िंदगी,
फिर भी तुझसे मोहब्बत कम न हुई।
ऐसा क्या हुआ कि तू हमसे रूठ गई,
पहले बता देती, तो तुझसे दिल लगाते ही नहीं।
कहाँ, क्यों, कैसे और कब हुआ यह सब,
ऐ ज़िंदगी, बता तो सही—
तू यूँ गुमसुम-सी बैठी क्यों है?
बड़े ख़्वाब संजोए थे तुझे पाने के,
मगर तूने ऐसा क्या किया,
कि हम ख़ुद को ही भूल बैठे।
बस एक एहसान और कर दे, ऐ ज़िंदगी—
जब जीने नहीं दिया तूने,
तो अब सुकून से मरने तो दे मुझे।
— विश्वम्भर प्रसाद सती
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