तक़दीर के भरोसे में कभी चला नहीं।
बोल के ख़ुदा मैं कभी आगे बढ़ा नहीं।
मैंने मोहब्बत में भी शर्म रखी है।
पास जाना तो दूर की बात, क़रीब से देखा भी नहीं है।
मैं कमज़ोर ही रहा हूँ।
मज़बूर ही रहा हूँ।
मौत थी क़रीब मेरे, और मैं उसके और करीब ही तो गया हूँ।
मुझे और कोई रास्ता नज़र नहीं आया।
मिलती रही मौत मुझे रोज़।
मगर हँस कर चली जाती हर रोज़।
ये सोच कर मुर्दों को मौत का ख़ौफ़ नहीं होता।
जिंदा लोगों को जिदंगी का पता नहीं होता।
मैं हूँ महज़ एक इंसान, जिसे मौत ने भी ठुकरा दिया होता।
मुझसे इंसाफ की कोई उम्मीद मत करना।
मैं खुदका इंसाफ खुद करता हूँ।
फ़िर चाहे मैं सही करूँ या ग़लत।
निर्णय को आखिर कार निर्णय करता हूँ।
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