पहले प्यार का पहला पैग़ाम लिखा था,
आज उसने अपने हाथों पर मेरा नाम लिखा था।
वो लकीरें सिर्फ़ मेहँदी की नहीं थीं दोस्तों,
हर रंग में उसने अपना एहतराम लिखा था।
लबों से कुछ भी कहना उसे मंज़ूर न था,
निगाहों ने मगर दिल का हर पैग़ाम लिखा था।
जब उसने हथेली मेरी ओर बढ़ाई थी,
क़िस्मत ने वहीं अपना नया मुकाम लिखा था।
धड़कनों ने पहली बार साज़ छेड़ा था,
रूह ने मोहब्बत का पहला कलाम लिखा था।
वो मुस्कुराई तो मौसम भी ठहर-सा गया,
हवा ने फूलों के नाम उसका सलाम लिखा था।
हम दोनों के दरमियाँ ख़ामोशियाँ बहुत थीं,
मगर हर ख़ामोशी ने तेरा ही नाम लिखा था।
न कोई वादा था, न कोई क़सम उठी थी,
बस एक भरोसे ने उम्र का इंतज़ाम लिखा था।
वो पल किसी किताब का हिस्सा नहीं था,
रब ने उसे सीधे दिल के नाम लिखा था।
वक़्त की धूल ने तस्वीरें धुँधली कर दीं,
पर यादों ने हर रंग को तमाम लिखा था।
दूरियों ने लाख कोशिश की हमें बाँटने की,
मोहब्बत ने हर फ़ासले को नाकाम लिखा था।
आज भी जब तन्हाई में वो लम्हा याद आता है,
दिल हर धड़कन पर तेरा ही नाम लिखा था।
अगर मोहब्बत की कोई तहरीर लिखी जाएगी,
उसका पहला हरफ़ तेरे नाम लिखा था।
और आख़िर में बस इतना ही कहूँगा—
पहले प्यार का पहला पैग़ाम लिखा था,
आज उसने अपने हाथों पर मेरा नाम लिखा था।
उस एक पल ने मेरी पूरी ज़िंदगी का,
सबसे ख़ूबसूरत अंजाम लिखा था।
— विकास त्रिपाठी "विक्की"
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