ख़याल अच्छा है मुझे छोड़ देने का,
पर क्या सच में ऐसा कर पाओगे तुम।
दर्द बिछड़ने का बड़ा ज़ालिम होता है,
क्या उस दर्द से गुज़र पाओगे तुम।
आज जो कहते हो कि भूल जाओगे मुझे,
कल मेरी यादों से भी बच पाओगे तुम।
इश्क़ अगर सच में कभी किया है मुझसे,
अपने ही दिल को कैसे समझाओगे तुम।
मैं तो ख़ामोशी ओढ़कर जी लूँगा मगर,
अपने हिस्से का सन्नाटा कहाँ छुपाओगे तुम।
वक़्त चाहे जितना भी बदल जाए मगर,
मेरी जगह किसी और को दे पाओगे तुम।
— विकास त्रिपाठी
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