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इबादत में तुम

                
                                                         
                            दुआओँ में लोग माँगते होंगे तुम्हें,
                                                                 
                            
मैंने इबादतों में चुना है तुम्हें।
हर ख़्वाब की पहली सहर हो तुम,
अपनी हर साँस में रखा है तुम्हें।
चाहत का कोई हिसाब नहीं,
दिल ने ख़ुदा-सा माना है तुम्हें।
लफ़्ज़ों से कहाँ होता है इश्क़,
ख़ामोशी ने भी पढ़ा है तुम्हें।
राहें चाहे जुदा ही क्यों न हों,
रूह ने अपना कहा है तुम्हें।
दर्द मिले तो मुस्कुरा लूँ मैं,
सब्र ने यही सिखाया है तुम्हें।
दुनिया ने लाख भुलाना चाहा,
यादों ने फिर बुलाया है तुम्हें।
मंज़िल चाहे नसीब न हुई,
सफ़र ने भी सराहा है तुम्हें।
इश्क़ अगर सच में इबादत है,
रब ने भी तो लिखा है तुम्हें।
दुआओँ में लोग माँगते होंगे तुम्हें,
मैंने इबादतों में चुना है तुम्हें।
- विकास त्रिपाठी 'विक्की'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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