ये दिल तुम्हारा ज़हन तुम्हारा हमारा क्या है।
ग़म भी है तो दिया तुम्हारा हमारा क्या है।
आप ही हैं जो क़ीमती हैं जहाँ की ख़ातिर।
हमारा होना ज़रूरी है क्या हमारा क्या है।
जिन्हें मयस्सर ये पहली सफ़ है वो बैठ जाएं।
कहीं भी बरक़त में हमको रख दो हमारा क्या है।
कौन पागल ख़ार-ओ-ग़ुल का हिसाब रक्खे।
ये आपकी ही तो रहगुज़र है हमारा क्या है।
कि आज सूखे लबों की ख़ातिर फ़रात खोलो।
प्यासा कोई भी मर न जाये हमारा क्या है।
-विकास कालाआमी
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