बैसाख माह में बुलावा आया जगन्नाथ जी का,
भोर मनोरम
बीच आनंददायक,
नगरी नारियल पानी से अटी,
निशुल्क ई रिक्शा धाम तक,
प्रचंड ग्रीष्म, नंगे पांव, लाल पत्थर,
पंक्ति में श्रद्धालू,
ठंडी ठंडी बौछार,
प्यासों को शीतल जल,
बुजुर्ग, असहायों के लिए व्हील चेयर,
लंबी पंक्ति,
दर्शन दुर्लभ से,
भला मानस आया,
भीड़ से निकाल,
परिवार को दर्श कराए,
धन्य हुआ जीवन अलौकिक छवि देख,
चढ़ावे में स्वर्ण आभूषण,
अनगिनत धनराशि,
भगवान कृष्ण,बलराम,सुभद्रा का भोग अलग अलग मूल्य का,
बलरामजी का भोग लिया,
आग्रह किया कृष्ण,सुभद्रा भोग खरीदने को,
सब एक में से ही खा लेंगे,
चढ़ावा चढ़ाने को कहा,
हम तो भगवान से मांगने आए हैं,
रसोई देखी,
घड़ों में पारंपरिक विधि से भोग बन रहा,
बावन मन प्रसाद बनता,
सबसे ऊपर वाले घड़े में सबसे पहले पकता भोजन,
बैसाख माह में बुलावा आया जगन्नाथ जी का
भीड़ मे चक्कर खाकर गिरा श्रद्धालु
प्रतिपल सेवा में उपस्थित गार्ड,
चमत्कारी पत्थर,
एक सिरे पर सिक्का ठोको,
दूसरे सिरे पर आवाज आती,
रोज नवीन ध्वज चढ़ता,
ग्यारह सौ साल पुराने गणपतिजी,
नए नवेले से,
कारण पूछा,
तेल और सिंदूर का मांजना करते,
नगर की शान मंदिर,
बीच बुलाए बार बार,
छैना पोडा और खाजा की मिठास,
ललचाए,
पुरी मनोकामना पूरी करता,
बीच देख मन हर्षित,
छैना पोडा की मिठास फैली जगह जगह,
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