किसके कंधे पर किसका बोझ
किसलिए यह व्यर्थ का तंबू तानना,
खूँटियाँ ठोंक यूँ डेरा लगाना?
कौन मरा है यहाँ किसके वास्ते,
लहू की उल्टियाँ कर-करके?
फिर भी लोग जीते ही हैं यहाँ,
मन की बंद कोठरियों में सड़ते हुए;
और फिर भी कैसे खिल उठते हैं बाग़ में,
ये सुर्ख़, ताज़ा गुलाब?
यहाँ सारे चिराग़
घुल-घुलकर बुझ जाते हैं,
पेड़ घने अंधेरे में ही
ठिठुरते हैं, बेबस झड़ जाते हैं,
फिर भी ज़िंदगी से बाज़ी लगाते हैं—
एक ही बात को घूँट-घूँट पीते हुए,
और कह उठते हैं ये मलंग फ़क़ीर:
"जो भी हो, राजा तो हम ही हैं!"
सूरज के डूबने से पहले ही अंत हो चुका,
जन्म तो बस एक ला'इलाज मर्ज़ है,
वेदना के ये गीत और क्या हैं—
इक खोखली मज़ार ही तो हैं!
जो वार करता है,
पहले उसी का शीश कटता है,
और फिर शहादत
उसी के गले का हार बन जाती है।
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