आँधियों में भी दीया मेरा बुझ न पाया,
मैं उसे अपना सामर्थ्य मान,
अहं में डूबता गया।
भ्रम चूर हुआ उस क्षण,
जब मंद पवन में भी वह टिक न पाया।
तब जाना,
सामर्थ्य से बड़ी है प्रभु-कृपा की छाया॥
-वन्दना सूद
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