यह कितना अश्लील होगा,
आग लगी घर में फिर भी
तुम खोए रहे अंतर्मन में।
कैसे धैर्य रख सके तुम
इस दुनिया के शोर से
आंदोलन की पृष्ठभूमि में भी
खोए रहे मन के दौड़ में।
खैर छोड़ो,
क्या दिल में नहीं आया संशय तुम्हारे मन में भी
न्याय करेगा अंतिम वो एक दिन, पूछेगा प्रश्न अनेक
कि आग लगी थी घर में फिर भी
क्यों खोए थे अंतर्मन में?
थोड़ा सा काम करते, आग बुझाने का नाम ही करते
हृदय तुम्हारा झंझोर न उठा, परिवार था जल रहा
इन आग की लपटों में फिर भी खोए रहे अंतर्मन के सपनों में
इस आंदोलन के दौर में साथ तुम्हें देना था
राष्ट्र की भूमि को पुनः पावन तुम्हे करना था
इन दानवों का संहार तुम्हारा था दायित्व,
फिर भी कर्तव्य विमुख होकर अपने अंतर्मन में
खोए रहे
तुम दलील दोगे
विचार था मेरा, यह मेरा ही विचार होगा
व्यक्तिवादी था मै यह मेरा ही अधिकार होगा
निजता मेरी आजादी,आजादी की ख्वाहिश थी
अंतर्मन में खोए रहना मेरे जीवन जीने की फरमाइश थी
हो सकता है अंतर्मन में रहना तुम्हारा अधिकार हो
लेकिन कर्तव्य से भागने पर तुम पर धिक्कार है
वे सजा सुनाएंगे तुमको, पर जीवन के इस पन्ने में
देव भूमि में भी तुम को चैन नहीं आया जीने में
तुमने जो कृत्य किया है ये कायरो की पहचान है
नरक के दरवाजे खुलते हैं जिओ अपने सपनों में
होंगे जब अत्याचार तुम पर तब तुम रोना मत
मांगोगे अपने अधिकार तुम्हारे, दंड मिलेगा तुमको जब
केवल अंतर्मन में सोए रहने का फल यही मिलेगा
निजता की ख्वाहिश भी एक स्वप्न लगेगा
जब भूख से तड़पने का तुमको हर दिन दंड मिलेगा
कोसोगे अपनी जिंदगी को, तब तुम्हें याद आएगा
जब बुझानी थी आग घर की तब भी तुम
सपनों में खोए रहे…..
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