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पुरुषों के आंसू

                
                                                         
                            तुम पुरुष हो !
                                                                 
                            
और पुरुष भी कहीं रोते हैं ?
दुनिया के इस एक वाक्य ने
न जाने कितने पुरुषों की आंखों में ठहरे आंसुओं को वहीं रोक दिया

धीरे-धीरे पुरुषों ने सीख लिया
चुप रहना,
अपने आंसुओं को हंसी के पीछे
छिपा लेना,
जैसे कोई नदी
अपने ही रास्ते से भटक कर
धरती के भीतर समा जाए
इसलिए बहुत गहरे दुख में भी
उनकी आंखें सूखी दिखती हैं

पर इसका मतलब यह नहीं कि
पुरुष रोते नहीं
वे टूटते हैं ! ठीक वैसे...
जैसे कोई पुराना घर धीरे-धीरे
भीतर से दरकता रहता है
वे अपनी हिस्से का दर्द कंधों पर
ढोते हुए
भीतर ही भीतर बर्फ की तरह
पिघलते है
बिना किसी शोर के ।

-- वेद प्रकाश तिवारी
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3 महीने पहले

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