आगमन हुआ तुम्हारा,
जब हमारी जिंदगी में।
जान को तुम डाल दी हो
चिलचिलाती जिंदगी में।
सिजदा नहीं किया था मैंने,
कभी हमारी जिंदगी में।
ये सिर जो है हर बार झुकता
अब तुम्हारी बंदगी में।
क्या कहूं क्या बात है?
जब से तुम्हारा साथ है,
हारना सीखा नहीं,
आई हो जब से जिंदगी में।
पर्वतों की चोटियों के ऊपर, जब पांव होगा
सिंधु की लहरों के बीच में कहीं ,जब नाव होगा
तप्त मरू में जब चलूं ,वहां खेजड़ी का छांव होगा
उसका जरिया तुम रहोगे,
क्योंकि तुम्हारा मेरे प्रति रह रहा वो भाव होगा।
जिंदगी में ख़्वाब है,
ख्वाब में तुम हो,
तुम बिना मैं हूं,
और मेरे बिना तुम हो।
एक पल भी रह न पाऊं,
प्रिए तुम्हारी याद मे।
लहरें उठ उठ वेदना की,
करती हृदय पर घात है
कैसे काटू उस समय को
जब नम आंखे दिन को भी,
कहती अभी भी रात है।
जान मेरी जिंदगी की,
तुमसे जुड़ चुकी अब सांस है,
जब भी आंखें बंद होती,
लगता यूं आप मेरे पास हैं।
जानेमन इस ज़िंदगी में
बस यही कयास है,
साथ तुम सदैव रहना
यही मेरी आस है।
जिंदगी के रंग को
तूने जो नया रंग दिया
मेरी व्यथा को जानकर
तूने जो मुझे अंक दिया
कृतकृत्य अब मैं हो चुका हूं
तूने मुझे जो संग दिया।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X