जब अवसाद, तनाव का घेरा हो;
हर ओर समस्या घेरा हो,
एकमात्र हो तुम इस विप्लव में;
खड़े, तने, बड़े होकर,
देते पथ पर फेरा हो।
काव्य जीवन का तुम डेरा हो!
जब नित उमंग पर फिरता पानी,
जब छाया में हो जाती कहानी;
उस समय का सवेरा हो।
काव्य जीवन का तुम डेरा हो!
जब मिलता नहीं कोई जय–पराजय,
सारी दुनिया दिखती आभामय,
तब प्रबोधन हेतु मेरे सिर को,
देते जब तुम फेरा हो
काव्य जीवन का तुम डेरा हो!
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