ज्ञान,पराक्रम, तेजो बल जो
अमूल्य निधि थी रावण की।
शास्त्र–सुसंगत, नीति–पारंगत
किसमें तुल्य विधि थी रावण सी?
देव,दानव में कौन बना था?
जो उससे डट कर रण करता।
फेंकें प्रखर अस्त्र–शस्त्र की,
धूमिल छवि क्षण–क्षण करता।।
लोकपाल हो, दिकपाल हो
गंधर्व हो या किन्नर नाग।
साहस खोते देख सामने,
छोड़ रण को फिर जाते भाग।।
पर नारी से काम अभिलाषा,
यही मृत्यु कारण बनीं।
अप्रतिम, अद्वितीय, उज्ज्वल लंका
वीर–चमू का रण बनीं।।
मन,मनसा में प्राप्त लालसा की
देते युगों तक घोर दंड।
हैं आज खेल रहें जो खूनों से
घूम रहे ताने शोर कोदंड।
रावण होकर रावण की प्रतिच्छवि में
आग लगाते हो?
है कहां शर्म? है कहां हया?
कहां हैं? अब तक राघव महान?
क्यों नहीं देखते? आज उपस्थित,
किस तरफ खड़ा है धर्मयान?
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