कर्म-प्रधान जगत की रचना,
खुद कर्तव्य निभाना होगा।
कर्मों की वेदी पर चढ़कर,
निज अस्तित्व बनाना होगा॥
कालचक्र की गति के सम्मुख,
सबको शीश झुकाना होगा।
सृष्टि-रचयिता 'राम' बने तो ,
उनको भी वन जाना होगा॥
हो सिंहासन या शिलाखंड,
सबको भार उठाना होगा।
हो सुख-सौरभ या दुःख-दावानल,
सबमें समभाव दिखाना होगा॥
नियति-नियोजित पथ पर चलकर,
खुद इतिहास बनाना होगा।
वज्रपात सहकर भी तुझको,
निज संकल्प बचाना होगा॥
भाग्य-ललाट लिखा जो विधि ने,
वह तुझको सहना होगा।
कंटकाकीर्ण धरा पर तुझको,
रक्त-सिक्त पग धरना होगा॥
यह वसुधा एक समरभूमि है,
अविचल आगे बढ़ना होगा।
सबके हिस्से कृष्ण न आते,
हे अर्जुन! खुद लड़ना होगा॥
सबके हिस्से कृष्ण न आते,
हे अर्जुन! खुद लड़ना होगा।
हे अर्जुन! खुद लड़ना होगा।।।
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