वक्त की पाबंदियों में,
थपेड़ों की कैसी मार।
हर कदम पर बंदिशें हैं,
सामने है एक दीवार।
किन्तु नियति के भंवर से,
माननी कैसी ये हार?
आँधियों के बीच भी,
रखना है खुद को तैयार।
कष्ट जितने भी मिलें,
पीड़ाएँ हों चाहे अपार।
सबकुछ सहकर भी,
जाना है उस पार।
धूप हो या घोर तम हो,
टूटने न पाए ऐतबार।
संघर्ष की इस भट्टी में,
तप कर ही निखरेगा आकार।
- शीतांशु शेखर द्विवेदी
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