कुर्सियों पर शान से बैठे,
खुद को जो भगवान समझते,
भाषणों के बड़े-बड़े पुल बांधे,
झूठे हर वादे करते,
गरीबों की बस्ती में, ये महलों के सपने गढ़ते।
नेता जी के पास बहानों का,
एक अंतहीन पिटारा है,
जनता को ठगने का इन्होंने,
हर अंदाज़ संवारा है।
फाइलों में दबकर रह जाती,
यहाँ हर इक फरियाद नई,
विकास कहीं बस कागज़ पर,
और जनता बेबस लाचारी है।
न्याय की देवी की आँखों पर,
पट्टी का पहरा गहरा है,
इंसाफ यहाँ बिकता महँगा,
न्याय का मंदिर सहमा-सहमा है।
तारीखों पर तारीखें मिलतीं,
न्याय यहाँ थक जाता है,
कमज़ोर की आहों का स्वर,
गलियारों में दब जाता है।
वर्दी वाले पहरेदारों की,
अपनी ही इक कहानी है,
रक्षक ही भक्षक बन बैठे,
पानी में ही आग लगाई है।
जुल्म सह र चुप रहने को,
जनता की अब मजबूरी है,
न्याय माँगने जाओ थाने,
तो आँखों में आंसू की पूरी है।
आरक्षण की उलझन में,
मेधा यहाँ कुम्हलाती है,
सपनों की सूखी डाली पर,
कोई धूप न आ पाती है।
कोटे की इस राजनीति में,
प्रतिभा दम तोड़ रही है,
योग्यता की हर दीवार यहाँ,
अपनों से ही छूट रही है।
बेरोजगारी की आँधी ने,
युवाओं के पर काट दिए,
डिग्रियां हाथ में थमाकर,
उनके सारे सपने बाँट दिए।
दर-दर ठोकर खाते फिरते,
डिग्रियाँ झोले में डाले,
भविष्य के इन कर्णधारों पर,
अंधेरे ने डेरे डाले।
चारों तरफ मची है लूट,
कोई सुनने वाला नहीं,
अंधेरगर्दी का यह आलम,
अब छिपने वाला नहीं।
जागो रे भारत के लोगो,
अब अपनी आँखें खोलो तुम,
इस अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध,
अब खुलकर बोलो तुम।।।
:
:- राकेश कुमार तिवारी
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