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विश्व खड़ा बारूद के द्वार

                
                                                         
                            विश्व खड़ा बारूद के द्वार
                                                                 
                            

फिर विश्व खड़ा बारूद के द्वार,
फिर मानवता दिखती लाचार।
मुख पर शांति, हृदय में बैर,
पीछे तलवारें हैं तैयार।

हर देश आज यह पूछ रहा—
किसकी सीमा, किसका अधिकार?
धरती सबकी, अम्बर सबका,
फिर किसका जग पर एकाधिकार?

कहीं युद्ध की ज्वाला धधकी,
कहीं भूख से बचपन रोता।
सत्ता के ऊँचे सिंहासन पर,
क्यों मानव छोटा ही होता?

मिसाइल की ऊँचाई बढ़ती,
मन का कद घटता जाता है।
विज्ञान चाँद तक जा पहुँचा,
इंसान से इंसान डरता है।

अब बाज़ारों में युद्ध छिड़े हैं,
व्यापारों पर पहरे भारी।
लाभ-हानि में जग को बाँटा,
कहाँ गई वह साझेदारी?

कहीं तेल बना सत्ता का बल,
कहीं नदियों पर पहरेदारी।
धरती माँ के टुकड़े करके,
कहते हैं—यह दुनिया हमारी!

तकनीक रोज़ नई राहें खोले,
बुद्धि नए संसार रचाए।
लेकिन यदि विवेक सो जाए,
कौन मनुज को राह दिखाए?

पल में ख़बरें विश्व नापतीं,
सच पीछे रह जाता है।
लाखों चेहरे रोज़ जुड़ें पर,
मन से मन कटता जाता है।

धर्म अनेक, विचार अनेक,
पर आँसू का कोई धर्म नहीं।
देशों की सीमाएँ होती हैं,
दुख की कोई सीमा नहीं।

क्यों भूल रहा मानव आखिर—
धरती केवल उसकी नहीं।
आज पड़ोसी का घर जलता है,
कल आग यहाँ आएगी नहीं?

सुन लो, सत्ता के मदवालो!
इतिहास यही दोहराता है—
जब शक्ति न्याय को रौंदेगी,
सिंहासन भी ढह जाता है।

शक्ति वही जो निर्बल के हित,
अपना सामर्थ्य लगाती है।
तलवार उठाने से पहले जो,
संवादों के दीप जलाती है।

जीत नहीं वह, जिसके पीछे
माताओं का क्रंदन रह जाए।
जीत वही, जिसमें मानवता
अपना मस्तक ऊँचा कर पाए।

शांति नहीं दुर्बल की भाषा,
शांति वीर का आभूषण है।
न्याय बचाकर युद्ध रोकना,
शक्ति का सच्चा भूषण है।

उठो विश्व के मानव! सोचो,
किस ओर समय को जाना है?
बारूदों पर कल को लिखना,
या प्रेम का दीप जलाना है?

न पूरब जीते, न पश्चिम जीते,
न उत्तर-दक्षिण हारें अब।
यदि जीत सुनिश्चित करनी है,
तो मानवता को जीतें सब।

जिस दिन भूखे को अन्न मिले,
हर निर्बल को सम्मान मिले।
शस्त्रों से पहले बात उठे,
हर पीड़ा को समाधान मिले।

उस दिन धरती मुस्काएगी,
जब नफ़रत अपनी हार लिखे।
बहुत बाँट ली दुनिया हमने—
अब मानवता संसार लिखे।

न कोई विजेता, न कोई पराजित,
न शक्ति का झूठा मान रहे।
धरती सबकी, भविष्य सभी का—
बस इतना-सा ईमान रहे।

बहुत हो चुका रक्त का लेखा,
अब प्रेम नया अध्याय रचे।
जो विश्व युद्ध से थक बैठा—
वह मिलकर नया भविष्य रचे।

— संतोष कुमार शर्मा
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2 दिन पहले

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