आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वो गलियां जो पीछे छोड़ आए हैं

                
                                                         
                            वो गलियां जो पीछे छोड़ आए हैं
                                                                 
                            

वो गलियां जो पीछे छोड़ आए हैं
जहां बचपन हंसता था कुछ सपने सजते थे
खुशबू थी मिटटी की आवाजे अपनों की
अपनों से मुंह यूं मोड़ आए हैं
वो गलियां जो पीछे छोड़ आए हैं ..........

पीछे मुड़कर देखे तो आंखें भर आएंगी
अगर रुके जरा तो सांसे थम जाएंगी
न जाने जिंदगी को किसी ओर लाए हैं
वह गलियां जो पीछे छोड़ आए हैं...........

लौट आए वो दिन तो क्या फर्क पड़ेगा
याद सब ताजा पाएंगे जब भी कोई जिगर चलेगा
वो ठहर गए पुराने पल अब नये पल और आए हैं
वह गलियां जो पीछे छोड़ आए हैं...........

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर