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उसी पल में ठहरा रहा

                
                                                         
                            उसी पल में ठहरा रहा
                                                                 
                            

सबसे मिलता तो हँसता रहा,
दर्द दिल में दबाता रहा,
लोग समझे कि खुश हूँ बहुत,
मैं भी हँसकर जताता रहा।

भीड़ के साथ चलता गया,
मन अकेला ही चलता रहा,
वक़्त आगे निकलता गया,
मैं उसी पल में ठहरा रहा॥

घर वही था, वही रास्ते,
वही कमरे, वही खिड़कियाँ,
सब तो अपनी जगह पर मिला,
बस न थीं अब वो आहटें वहाँ।

घर में हर दिन गुज़रता गया,
एक कोना मगर चुप रहा,
वक़्त आगे निकलता गया,
मैं उसी पल में ठहरा रहा॥

शाम ढलती तो लगता मुझे,
तुम अभी लौट आओगे फिर,
कोई आहट जो होती कहीं,
पाँव दर तक चले जाते फिर।

दर तो हर बार खुलता रहा,
दिल किसी को बुलाता रहा,
वक़्त आगे निकलता गया,
मैं उसी पल में ठहरा रहा॥

ख़त पुराने हटा भी दिए,
सब निशाँ भी मिटा ही दिए,
तेरी तस्वीर रख दी परे,
तेरे किस्से भुला भी दिए।

जो नज़र से उतरता गया,
वो मेरे दिल में गहरा रहा,
वक़्त आगे निकलता गया,
मैं उसी पल में ठहरा रहा॥

दिन ने दुनिया में उलझा लिया,
रात ने फिर तुम्हारा किया,
दिन में खुद को सँभाले रखा,
रात ने फिर किनारा किया।

दिन उजालों में ढलता गया,
रात में दर्द जगता रहा,
वक़्त आगे निकलता गया,
मैं उसी पल में ठहरा रहा॥

तुमको रोका नहीं था कभी,
तुमको वापस बुलाया नहीं,
तेरी राहों में आया नहीं,
अपना हक़ भी जताया नहीं।

तुम तो अपनी डगर चल दिए,
दिल दुआएँ ही देता रहा,
वक़्त आगे निकलता गया,
मैं उसी पल में ठहरा रहा॥

अब न शिकवा, शिकायत नहीं,
अब कोई तुमसे चाहत नहीं,
तुम जहाँ हो, वहीं खुश रहो,
इससे बढ़कर इबादत नहीं।

मैं भी जीना तो सीखता गया,
एक रिश्ता मगर रह गया,
वक़्त आगे निकलता गया,
मैं उसी पल में ठहरा रहा॥

आज मुद्दत के बाद ये लगा,
दर्द भी अपना लगता मुझे,
तुम नहीं हो तो शिकवा भी क्या,
याद होना ही काफ़ी मुझे।

मैं भी आगे निकलता गया,
कुछ तुम्हारा ही मुझमें रहा,
वक़्त आगे निकलता गया,
मैं उसी पल में ठहरा रहा॥
— संतोष कुमार शर्मा

 
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2 घंटे पहले

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