मेरे दिल में एक जलता दीया,
जिसकी बाती ने हमेशा जलने का प्रण लिया।
एक ऐसी तलाश मेरी आँखों की,
जिसको पूरी नहीं कर सकी हाज़िरी लाखों की।
एक ऐसी आस मेरे मन की,
जिसके बिना नहीं चल सकती नाव जीवन की।
एक ऐसी मंज़िल जो कभी मिली ही नहीं,
जिसकी चौखट पर आने पर भी जिसका दरवाज़ा खुला ही नहीं।
एक ऐसी मन्नत जिसके धागे मैंने बाँधे हर दरबार में,
और उम्मीद रखी—शायद पूरी हो इस बार में।
एक ऐसी प्यास जो कभी बुझी ही नहीं,
एक ऐसी पहेली जो कभी सुलझी ही नहीं।
एक ऐसा ख़्वाब जो कभी मुकम्मल न हो सका,
सोए तो हम भी बहुत, पर तुम्हारा तसव्वुर न हो सका।
एक ऐसी तस्वीर जिसमें मैंने प्यार का रंग भरा है,
क्यों इतनी रंगहीन है, जबकि कैनवास पर रक्त बिखरा है?
एक ऐसा दरख़्त जिसको मैंने साँसों से सींचा हुआ है,
अब सिर्फ़ आँसू हैं—जिन्होंने उसे ज़िंदा रखा हुआ है।
एक ऐसी याद जिसने न जाने कितने तकिए भिगोए हैं,
हम गिन भी नहीं सकते कि कितनी दफ़ा हम रोए हैं।
एक ऐसी कल्पना जिससे मैं घंटों बातें करती हूँ,
छिन न जाए मुझसे ये भी, सोचकर बहुत डरती हूँ।
एक ऐसी दुआ जो क़ुबूल होनी अभी बाकी है,
जल रही हूँ मोमबत्ती की तरह, न जाने कितना धागा और बाकी है।
एक ऐसा लक्ष्य जिसको पाने का प्रयास अभी जारी है,
लाखों सीढ़ियाँ हैं और एक-एक साँस भारी है।
एक ऐसा आशियाना जिसको मैंने बनाया था तिनका-तिनका जोड़कर,
क्या आपका दिल नहीं दुखा, जो रख दिया यूँ तोड़कर?
तुम हो एक विशाल समुद्र जिसके किनारे,
मैं तड़प रही हूँ मीन-सी जल के मारे।
कितने पतझड़, कितने सावन बीत गए यूँ ही तुम बिन,
बताओ कौन-सी रात हो या कौन-सा हो तुम दिन?
एक ऐसा चाँद जिसकी झलक मुझे फ़लक पर दिखी ही नहीं,
न जाने कितने करवाचौथ बीते, पर मेरी प्यास मिटी ही नहीं।
एक ऐसी चाहत जिसको मैं चाहूँ अगले जन्म में भी,
फिर तुझे पाने को मैं मरूँ और मुस्कुराऊँ कफ़न में भी।
— पूजा शर्मा
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