आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तेरे शहर में अब मेरे ठिकाने हो गए हैं।

                
                                                         
                            वो चाहत के दिन अब पुराने हो गए हैं,
                                                                 
                            
तेरी गली से गुज़रे ज़माने हो गए हैं।

जिन ख़तों में कभी दिल की बातें लिखी थीं,
वो पन्ने भी अब सारे फ़साने हो गए हैं।

तेरी तस्वीर से जो बातें किया करते थे,
वो लम्हे भी अब दिल से बेगाने हो गए हैं।

कभी तेरी ख़बर से साँस चलती थी हमारी,
अब तेरे ज़िक्र के भी बहाने हो गए हैं।

भुलाने की बहुत हमने कोशिश की मगर,
कुछ ज़ख़्म तो उम्रों के निशाने हो गए हैं।

तुम छोड़ गए शहर, मगर दिल ने नहीं छोड़ा,
तेरे शहर में अब मेरे ठिकाने हो गए हैं।

जिसे खोकर लगा था कि अधूरे हैं हम,
उसी के बाद ख़ुद से सयाने हो गए हैं।

‘विरेन’ वो लौट भी आए तो मौसम नहीं लौटे,
तेरे शहर में रहकर भी हम पुराने हो गए हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर