स्वर्ग - नर्क की बातें जितनी
उतनी ही मज़ेदार हैं
हर कर्म का लेखा जोखा
किसी एक द्वार में प्रवेश - आधार है
हर कोई अपनी व्याख्या में
गढ़ता इनका सार है
पर प्रभु श्रीकृष्ण के अर्थों में -
ये तो मनःस्थिति का विधान है
हर मन सुख में है तो वो स्वर्ग
अन्यथा नर्क के समान है
अपनी बात करूँ तो
इन मनोस्थिति से मैं अक्सर ही
खुद को परिस्थितिवश बंधा पाता हूँ
जब पापा चिन्तामुक्त दिखे
तो वो क्षण स्वर्ग हो जाता है
और अगर वो चिन्तित हो,
तो हृदय नर्क को दिखलाता है
माँ के ना होने पे वो
अब खुद माँ का भी किरदार निभा रहे है
समय - समय पर खुद सबके लिए
लज़ीज़ खाना बना रहे हैं
कभी - कभी विचारों में
जब सहमति नहीं बनती
तो उसे अब प्यार से समझा रहे है
माँ के साथ दादी माँ का भी
किरदार वो बखूबी निभा रहे है
अक्सर जब वो परेशान हो
तो मन आज भी नर्क सा अनुभव पाता है
पता नहीं क्यों आज भी
उनके बिना घर, घर नहीं लग पाता है
पर कुछ आदतें
कभी-कभी परेशान कर जाती है
और उसमें उनका गुस्सा शामिल हो
तो सीधे नर्क - भट्टी का अनुभव दे जाती है
पर जब वो खुश हो
तो घर भी चहक उठता है
उनके क्रियाकलापों से प्रभाव कुछ भी हो
मन खुद को स्वर्ग सा सुखमय पाता है
उस क्षण खुद को इंद्र- समान सा पाता हूँ
जब उनके चरणों की रज को माथे पे लगा पाता हूँ
सत्य तो ये है माँ बिन अगर संसार अधूरा भले लगता है
मन में वेदना का ज्वार हमेशा उठता रहता है
किंतु पापा के साथ होकर
हर वक़्त सही क्षण बन जाता है
चाहे डांट मिले या प्यार
उनके सामने होने भर से
ईश्वररूपी आशीर्वाद मिल जाता है।
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