आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नित नए नए स्वांग भरू

                
                                                         
                            क्या ही मैं श्रृंगार करू
                                                                 
                            
नित नए नए स्वांग भरू

तुमने जितने वादे किये थे
तुमने जितनी कसमें ली थी
दुख से भरा हुआ दिल कहता
क्यू साजन तुम रूठ गए
सात जन्म के वादे के
एक वर्ष में टूट गए

तुम ही बताओ कैसी मेरी हालत
क्या ही में श्रृंगार करु
छोड़ गए जो तुम मुझको
किसी और से क्या आस करू

तुमने मुझे आजादी दी
लेकिन हद बताकर दी
हद बताकर दी जाए
वो आजादी नहीं जंजीर है
आजादी के नाम पर
तुमने कुचला मेरा जमीर है

तुम ही बताओ कैसी मेरी हालत
क्या ही में श्रृंगार करु
छोड़ गए जो तुम मुझको
किसी और से क्या आस करु



 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर