मौन की चादर ओढ़ कर
भीड़ को पीछे छोड़कर।
अकेले वक्त बिताना है
अब खुद के करीब आना है।
भीतर का समंदर गहरा है
मन पर प्रश्न का पहरा है।
शोर सवालों का है भरा
दुनिया में कोई न ठहरा है।
गहरे जख्म भी भर जाते हैं
शब्द शोर में खो जाते हैं।
हो शान्तचित् एकांत अगर
तो भाव कविता बन जाते हैं
मौन का भी है रूप निराला
सन्नाटे में फैला उजाला।
शान्त झरोखे से एकांत मांगे
मन का दीपक जिसने पाला।
-पायल शर्मा
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