बदलकर आजादी के मायने फिर पश्चिम की बेड़ियां बांध रहा है,
लांघकर संस्कारों की दहलीज युवा न जाने किस ओर जा रहा है।
विचारों की तपिश थी इतिहास के तरुण पन्नों में ,
राष्ट्र हित था उस युग के वीरों में,
निज हित में आज जोश धुंध में उड़ता जा रहा है,
लांघकर संस्कारों की दहलीज युवा न जाने किस ओर जा रहा है।
युवा तुम वायु हो नव ऊर्जा, नव चेतना,देश के कर्णधार तुम,
नई सदी के नव निर्माण के हो शिल्पकार तुम,
पश्चिम में तो ढलता है सूरज, पूर्व दिशा का आलोक हो तुम।
ना व्यर्थ करो अपने सामर्थ्य को,
अपनी शक्ति को पहचानो तुम।
कि वक्त नये युग का आ रहा है,
भारत अपनी ही दहलीज पर नव निर्माण चाह रहा है।
-नीता टहलयानी
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