समुद्र से उठी एक बेचैनी
समुद्र की गर्म हथेलियों पर
जब धूप कुछ ज़्यादा ठहर जाती है,
जलवाष्प बनकर एक बेचैनी
आकाश की ओर चली जाती है।
पीछे रह जाता है
एक निम्नदाब का खालीपन,
और चारों दिशाओं से हवाएँ
खींची चली आती हैं—
जैसे किसी अधूरे मन को
हर ओर से कोई अपना याद आता है।
फिर कोरिऑलिस बल
उन हवाओं की राह बदल देता है,
जो सीधे उसके पास आना चाहती थीं,
उन्हें भी घूमकर आना पड़ता है।
हवाएँ मिलती हैं,
पर मिलकर ठहर नहीं पातीं—
बस घूमती रहती हैं,
एक-दूसरे के चारों ओर,
जैसे कुछ रिश्ते
पास होकर भी
कभी एक जगह नहीं ठहर पाते।
नम हवाएँ ऊपर उठती हैं,
ठंडी होती हैं,
बादल बनती हैं,
और संघनन की गुप्त ऊष्मा
उसके भीतर फिर आग भर देती है।
वह और गहरा होता जाता है—
निम्नदाब,
और तेज़ होती जाती हैं हवाएँ,
जैसे भीतर का खालीपन
हर उत्तर के साथ
एक नया प्रश्न जन्म देता हो।
और फिर उसके बीच
एक आँख बनती है—
अजीब है न?
चारों ओर तबाही,
बादलों की गर्जना,
हवाओं का शोर,
और ठीक बीच में
एक गहरी खामोशी।
शायद तूफ़ान भी जानता है
कि हर चीख के बीच
एक जगह ऐसी होनी चाहिए
जहाँ मन चुप रह सके।
पर उस शांति के चारों ओर
आँख की दीवार होती है—
सबसे तेज़ हवाओं की,
सबसे घने बादलों की,
सबसे भारी बारिश की।
जैसे इंसान भी
अपने सबसे शांत चेहरे के पीछे
सबसे बड़ा तूफ़ान छिपाए रहता है।
फिर एक दिन
वह समुद्र छोड़कर
स्थल पर आ पहुँचता है।
वही धरती,
जहाँ उसे अपनी ऊर्जा नहीं मिलती,
जहाँ घर्षण बढ़ जाता है,
जहाँ नमी कम पड़ जाती है।
और धीरे-धीरे
उसका वेग टूटने लगता है।
चक्रवात क्षीण होने लगता है।
शायद इसलिए
हर तूफ़ान का एक अंत होता है—
क्योंकि कोई भी ऊर्जा
अनंत नहीं होती,
कोई भी बेचैनी
हमेशा नहीं रहती।
समुद्र से जन्मा था वह,
समुद्र से ही शक्ति पाई थी,
और जब वही स्रोत छूट गया—
तो उसकी सारी प्रचंडता
धीरे-धीरे शांत हो गई।
तब समझ आया—
तूफ़ान हमेशा बाहर नहीं होता,
कभी-कभी वह भीतर जन्म लेता है।
और उसे शांत करने के लिए
किसी किनारे की नहीं,
बस उस स्रोत से दूर होने की ज़रूरत होती है
जो उसे बार-बार ऊर्जा देता है।
-रोशनी पाण्डेय
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