झूठ के इस दौर में भी, सच का दीप जलाता रहा।
दुनिया नमक लिए खड़ी थी, मैं ज़ख़्मों को दिखाता रहा॥
चेहरों के पीछे चेहरे देखे, फिर भी अपना मान लिया।
जिन रिश्तों में स्वार्थ मिला था, उनमें भी विश्वास किया॥
जिन हाथों को थामा मैंने, वही हाथ छुड़ाते गए।
जिनके आगे ढाल बना था, वही घाव लगाते गए॥
टूटे मन के टुकड़े लेकर, ख़ुद को फिर समझाता रहा।
आँखों में जब नमी उतरती, होंठों से मुस्काता रहा॥
हर ठोकर को पाठ बनाया, हर पीड़ा से ज्ञान लिया।
राहों में जो काँटे आए, उनको भी वरदान लिया॥
वक़्त ने जब-जब मुझे परखा, भाग्य ने भी वार किए।
गिरने का अफ़सोस न पाला, गिरकर फिर से पाँव धरे॥
जिन राहों में दीप जलाए, वहीं अँधेरा पाया था।
सबके हिस्से धूप सजाई, ख़ुद पर बादल छाया था॥
उस अँधियारे से भी मैंने, अपना दीप जलाना सीखा।
जब कोई भी हाथ न आया, ख़ुद का हाथ थामना सीखा॥
मेरी सरलता को दुनिया ने, कमज़ोरी का नाम दिया।
मेरे मौन को हार समझकर, हर आघात तमाम दिया॥
उस मौन को कवच बनाकर, हर तूफ़ाँ से लड़ता गया।
बाहर जितना शोर बढ़ा था, भीतर उतना दृढ़ होता गया॥
कुछ रिश्ते आशीष बने तो, कुछ रिश्तों ने घाव दिए।
कुछ ने जीवन प्रेम से भर दिया, कुछ ने गहरे पाठ दिए॥
उन घावों से इतना जाना, हर अपना, अपना होता नहीं।
जो विपदा में हाथ न छोड़े, उससे सच्चा रिश्ता नहीं॥
अब न शिकवा, न कोई मलाल, जो पाया स्वीकार किया।
फूल मिले तो माथे रक्खे, काँटों को भी प्यार दिया॥
झूठ भले कुछ पल इतराए, उसकी आख़िर हार रही।
सच की राह कठिन थी लेकिन, मन में सदा बहार रही॥
पूछे कोई—सच की राह में, क्या खोया, क्या पाया है?
कुछ रिश्ते छूटे, ज़ख़्म मिले, पर मन ने सिर न झुकाया है॥
क़ीमत चाहे जो भी माँगे, सच का सौदा करूँगा नहीं।
सारी दुनिया रूठे मुझसे, मैं ख़ुद से कभी हारूँगा नहीं॥
— संतोष कुमार शर्मा
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