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वो मन्नतों का था जो धागा, वो भी गुमा दिया हमने

                
                                                         
                            छोटी-छोटी बातों को दिल से लगा लिया हमने,
                                                                 
                            
फिर ये हुआ कि एक-दूजे को भी भुला दिया हमने।

रिश्ते जो बनाए थे हमने कभी जन्मों-जन्मों के,
उन रिश्तों पर भी पूर्ण विराम लगा दिया हमने।

हमें जब हम जैसा कोई भी सारे जहाँ में मिला ना
फिर एक-दूजे से ही ये धोखा खा लिया हमने।

ये धुआँ, ये आग की लपटें क्या ही करतीं हमारा,
अपने हाथों से ही घर अपना जला दिया हमने।

हो सकती नहीं तुरपाई टूटते रिश्तों की, संदीप,
वो मन्नतों का था जो धागा, वो भी गुमा दिया हमने।
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एक घंटा पहले

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