सावन में सरिता को
यह नहीं रहता आभास,
बिन मेघ सूख जाएगा
उसका भी कंठ।
फिर भी उन्माद में
तट की सरहद को जब
लाँघती उफान के आगोश में,
उजाड़ देती कई बस्तियाँ।
कितने भी कुशल हों नाविक,
अति-आत्मविश्वास के अहंकार में
फँसकर भँवरजाल में,
डूब जाती कश्तियाँ।
वृक्ष कितना भी हो पुरोधा,
पतझड़ में
साथ छोड़ देती हैं
एक-एक कर सारी पत्तियाँ।
रोशन दीप में
कितना भी हो घृत,
आँधी जब आती है,
बुझ जाती हैं सारी बातियाँ।
जून माह में तपन
कितना भी करे
अपनी शोहरत और स्वभाव का अभिमान,
बादल घुमड़कर बरसते हैं,
धराशायी हो जाता उसका भी गुमान।
विलासिता की प्रतिस्पर्धा के पथ पर
इठलाता इंसान,
दौलत और शोहरत पर भले करे नाज़,
उखड़ती जब साँसें,
संचित संपदा को समेटने का
समय तक नहीं देते यमराज।
-कैलाश सनोलिया
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