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हर सत्य ने फिर सत्य बुलाया।

                
                                                         
                            मुंबई की बारिश
                                                                 
                            

आज फिर मुंबई पर,
बादलों की चादर छाई।
नर्म हवा ने छूकर पूछा—
“आज फिर किसकी याद आई?”

खिड़की के शीशे पर
एक बूँद ठहरी है,
जैसे भूले नाम की
आख़िरी स्याही गहरी है।

सड़कें चमक रही हैं,
पेड़ों की धूल उतर गई,
भागती-दौड़ती मुंबई
कुछ पल को आज ठहर गई।

लोकल की खिड़की से
भीगे चेहरे झाँक रहे,
भीड़ भरी छतरियों में
रंग नए-से जाग रहे।

भुट्टे के धुएँ में
अदरक वाली चाय घुली,
ठंडी हवा के संग कोई
पुरानी याद फिर मिली।

मरीन ड्राइव की लहरें
पत्थरों से टकराती हैं,
कुछ कहने को आती हैं,
बिन कहे लौट जाती हैं।

एक छोटी-सी छतरी में
दो साये साथ चल रहे,
बूँदों से बचते-बचते
एक-दूसरे में ढल रहे।

शाम उतरती धीरे-धीरे,
रोशनियाँ जल जाती हैं,
भीगी सड़कों पर जैसे
आकाश उतर आता है।

रात हुई, बारिश धीमी,
हवा हुई कुछ नम-नम,
किसी मेज़ पर चाय रखी,
किसी दिल में भीगा मौसम।

शहर सुबह फिर दौड़ेगा—
ट्रेनें, हॉर्न और सीढ़ियाँ,
जल्दी में उठते कदमों संग
भागेंगी फिर गलियाँ।

फिर भी मन के कोने में
एक बूँद बची रहेगी,
इस तेज़ शहर के भीतर
नर्मी चुपचाप बसी रहेगी।

मुंबई कभी नहीं रुकती,
बस बारिश में झुकती है,
अपने भीतर के समंदर से
कुछ पल जाकर मिलती है।

जो उस मिलन को देख सके,
वह चाहे जितना भागे,
उसके भीतर भीगी मुंबई
हर मौसम में जागे।
-संतोष कुमार शर्मा
 
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एक महीने पहले

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