मिलता तो मिलकर भी कुछ नहीं,
गर रूहों का आपस में कोई वास्ता ना हो।
मंज़िलें भी वहाँ अजनबी सी लगती हैं,
जहाँ इंसान का खुद से ही राब्ता ना हो।
ये दुनिया, ये महफ़िल, ये चेहरों का शोर,
सब रेत के महल हैं, जो एक दिन ढह जाएँगे।
तुम औरों की नज़रों में अपना वजूद क्या ढूँढते हो?
यहाँ लोग बस अपनी सहूलियत से पास आएँगे।
समझ का तकाज़ा है, अब भीतर उतरो,
बाहर की इस अंधी दौड़ में क्या रखा है?
अहंकार की भारी चादर को उतार कर देखो,
इस 'मैं' और 'तू' की झूठी दीवार में क्या रखा है?
पाने की अंधी चाहत में जो सुकून खो दिया तुमने,
वो अब दुनिया के किसी बाज़ार में बिकता नहीं।
यह महज़ भ्रम है कि औरों से मुकम्मल हो तुम,
सतही रिश्तों में सच्चाई का मोती कभी टिकता नहीं।
ठहर जाओ ज़रा, सुनो अपने मौन की सदा,
वही एक सच्चा साथी है, जो कभी छलता नहीं।
भीतर की शून्यता को अपनाना सीखो ऐ मुसाफ़िर,
क्योंकि इस दिखावे की दुनिया में,
मिलता तो मिलकर भी कुछ नहीं।
- शीतांशु शेखर द्विवेदी
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