मैंने उसे अपने दिल के कोने में कुछ यूँ सजा रखा है, जैसे गंगा किनारे बनारस बसा रखा है।
उसकी यादों के दीये बुझने नहीं देता हूँ मैं, अपनी पलकों पे इक छोटा-सा घाट सजा रखा है।
वो मिले या न मिले, ये मुक़द्दर की बात है, मैंने हर दुआ में उसका नाम छुपा रखा है।
उसकी आँखों में देखा था जो सुकून का मंज़र, आज तक दिल ने वही ख़्वाब बचा रखा है।
वो गुज़रता है मेरी सोच की गलियों से अक्सर, जैसे किसी ने बनारस में घर बना रखा है।
न कोई शोर है इसमें, न कोई दावा-ए-मोहब्बत, मैंने ख़ामोशी को ही अपना पता बना रखा है।
लोग कहते हैं कि भूल जाओ उसे अब तुम, मैंने तो उसकी याद को अपना ख़ुदा बना रखा है।
वक़्त की आँधियाँ क्या बिगाड़ेंगी इस रिश्ते का, मैंने मोहब्बत को रूह में कुछ यूँ बसा रखा है।
कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं, मगर ख़ूबसूरत इतनी होती हैं कि उम्र भर दिल में बनारस बनकर रहती हैं।
-अतिशा माथुर
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