मां की इतनी साड़ीयो मे दिखी एक पुरानी साड़ी,
जिसका रंग फीका पड़ चुका था,
कोने फट चुके थे, फॉल उधड चुकी थी,
फिर भी इतने प्यार से तह कर के रखा था,
जैसे मानो आज ही धो कर रखी हो,
वो सिर्फ साड़ी ही नहीं थी
उससे जिंदगी भर का भाव विभोर जुड़ा था,
उसमें बसी थी यादें हमारी, उसके पल्लू से ही
हमारे हाथ पोछे, पसीना पोछा,
मां की यह साड़ी उनकी अंतरात्मा है,
जो उनकी जीवन के सबसे करीब हैं।
-आकांक्षा गुप्ता
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